Brilliant poem by my DAD
Sunday, November 13, 2011
विश्व नागरिक
मैं उस देश का वासी हूँ ,
जो भारत महान कहलाता है
विश्व गुरु भी यही देश है
दे दी विद्या दुनिया को
जो शून्य ज्ञान कहलाता है
शून्य ज्ञान से जाना विश्व
यह गणन विज्ञानं कहलाता है
मैं उस देश का वासी हूँ
जो भारत महान कहलाता है
योग ज्ञान भी इस धरती का
रहा सदेव ही साथी है
धर्म गुरु इसे अपनाते
देशाटन को आते जाते
योग विद्या का फंडा इनका
हर देश में फहराता है
मैं उस देश का वासी हूँ
जो भारत महान कहलाता है
भारत महान का हर एक वासी
आगे चलना चाहता है
अपना स्वार्थ रख सबसे ऊपर
दूसरों को दुतकारता है
मैं उस देश का वासी हूँ
जो भारत महान कहलाता है
दुःख दर्द बदहाली में
जब सरे पडोसी आते थे
विषम परिस्थिति में सबकी
सहायता पाते थे
अब हर निवासी उस भारत का
बन गया विकत निज स्वार्थी है
अडोस पड़ोस का दुःख क्या जाने
स्वयं अपने घाव सहलाता है
मैं उस देश का वासी हूँ
जो भारत महान कहलाता है
विशव गुरु का मुकुट पहन कर
चेतना बन गई विश्वव्यापी
लकिन नजरिया अपना
संकुचित रहा व् निज स्वार्थी
क्या देखेंगे औरों के दुःख को
अपनों को भी भुला दिया है
दूसरों को हम है ज्ञान बांटते
निज का अवगुण भुला दिया है
अंतर्मन से न सोचा हमने
क्या देश ने खोया है
यह मैं हूँ ये मेरा देश है
कहने में हकलाता हूँ
मैं उस देश का वासी हूँ
जो भारत महान कहलाता है
विज्ञानिक और बुद्धिजीवी सब
मेरे देश के वासी हैं
स्वर्ण प्रभा के पर्लोभन में
सब के सब अब बन गये प्रवासी हैं
रह गये देश में बचे खुचे
जो डगर डगर के वासी हैं
किन्तु लिपटा भ्रष्टाचार में
और स्वयं सिद्ध कहलाता है
मैं उस देश का वासी हूँ
जो भारत महान कहलाता है
पहले हम थे गुरु विशव के
अब घंटाघर कहलाते हैं
नैतिकता दी त्याग है हमने
अब सुंदर सपने देखते हैं
पी कर दूध हम अपनी माँ का
उसीको घुटने टिकाते हैं
माँ तो क्या चीज़ हमारी
हम मातृभूमि को लज्जाते हैं
जहाँ रहे सब भ्रष्टाचारी
वो भारत देश कहलाता है
मैं उस देश का वासी हूँ
जो भारत महान कहलाता है
पुनः बन गये विश्व गुरु हम
नई नीति नए व् कमानों से
भ्रष्टाचार का पाद पदाते
बिना शर्म बिना मानों के
अब हम हैं नए विश्व नागरिक
बिना नाम , पता , पहचनो के
विश्व विजेता बन गये अब हम
नई कीर्ति पाई है
भ्रष्टाचार के माप बिंदु पर
प्रथम देश जो आता है
मैं उस देश का वासी हूँ
जो भारत महान कहलाता है.
Labels: hindi poem
posted by Shruti Kohli @ 9:59 PM,
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